भैरवी
प्रकृति की तू उग्र ज्वाला है,
न तुझे जीवन की सीमा बाँध सके,
न मृत्यु की परछाईं तुझसे डराये।
तू काल की स्वामिनी है —
जहाँ समय भी सिर झुकाता है,
और मृत्यु भी चरणों में पड़ी
मुक्ति की याचना करती है।
तेरा नृत्य ही सृष्टि का स्पंदन है,
तेरी दृष्टि में संहार भी करुणा है,
तेरे रौद्र रूप में भी प्रेम की गहराई है।
तू नारी नहीं, तू ऊर्जा है —
साक्षात चैतन्य की शक्ति।
सत्य की मूर्ति, चेतना की धार।
जो तुझे जान ले,
वह स्वयं से परे चला जाता है।
वह न मृत्यु से डरता है,
न जीवन से बंधता है।
भैरवी! तू न क्रोध है, न करुणा —
तू दोनों के पार की मौन सत्ता है।
तू ही प्रश्न है, तू ही उत्तर।
तू ही ज्वर है, तू ही शांति।