छोड़ न जाति की बातें, उड़ कर चेतना की बात करें
मनुष्य की पहचान करें, आत्मा से मुलाक़ात करें।
न रंग देख, न रूप देख, न वंश, न कोई जात,
सब एक ही सृजन के अंश हैं, यही है सत्य की बात।
धर्म, संप्रदाय, सीमा रेखा, सबने बांटा इंसान,
कभी नाम पर, कभी बानी पर, कर दिया मन को हैरान।
अब वक़्त है चेतना का, अब वक़्त है जागरण का,
भीतर जो दीप जलेगा, वही बनेगा पथ साधन का।
जब अंतर में प्रेम जगेगा, और भेद मिटेंगे मन से,
तब देखो यह धरती भी बोलेगी, "अब शांति है हर क्षण से।"
छोड़ न जाति की बातें, अब उड़ चलें विचारों में,
जहाँ न कोई छोटा-बड़ा, सब बस एक प्यारों में।
आओ चेतना का दीप जलाएं,
मानवता के गीत गाएं।