पीड़ा कभी gender के अकॉर्डिंग कम ज्यादा नहीं होती है हा उसको बताने जताने का दायरा जेंडर के अकॉर्डिंग हो जाता है क्योंकि समानता केवल शब्दों कपड़ों और पैसों से है दिखावे से हैं। असल में तो कोई अपनी उंगली खींच के बड़ी कर रहा या कोई ज्यादा सह के....लेकिन दोनों जगह इसके विपरीत स्थिति अब भी हैं।
मौत से ज्यादा जो लोग आपस में बर्ताव करते एक दूसरे को धोखा देना झूठ बोलना , नाजायज फायदा उठाना , जान ले लेना , या अपने नशे में अपनी हवस में किसी के तन मन को कुचल देना एक एक नसों को छिलने जैसा दर्द दे जाना या इन सब से भी बुरा कर जाना । मुझे तो कोई कितना बुरा कर सकता है वो लिखने में भी कन्फ्यूजन हो रही है रोज कुछ नया ट्रेंड आ जाता है इसमें । पहले कपड़ों का फैशन रहता था अब बुरे का फैशन चल रहा रोज कुछ नया अपडेट होते रहता है । अब सोचो जिंदा इंसान कितना डरा सकता है । किसी को किसी पर भरोसा नहीं । कोई नहीं कह सकता कि फला इंसान सही होगा या नहीं । इतना खौफ तो corona ने भी नहीं फैलाया था । मेरे हिसाब से तो इंसान का बर्ताव ही सबसे ज्यादा डरावना है।