"फिर वही राहगुज़र क्यों न हो..."
by Fazal Esaf
फिर वही राहगुज़र क्यों न हो,
कुछ पुरानी सी नज़र क्यों न हो।
जिस जगह टूट गए थे हम कल,
वो ही मंज़िल का सफर क्यों न हो।
बात ठहरी है लबों तक अब भी,
दिल में उठती वो सिहर क्यों न हो।
तू जो खामोश रहा उम्र भर,
तेरी चुप में भी असर क्यों न हो।
हमने खो कर भी तुझे पाया है,
ये मेरा आख़िरी डर क्यों न हो।
ख्वाब से जागे तो जाना ये ही,
नींद में तेरा शहर क्यों न हो।
अब चलें फिर से उसी मोड़ तक,
जो अधूरा था, मुकम्मल क्यों न हो...