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"तुम बोलो..."
तुम बोलो,
और मैं चुप होकर सुनूं,
तो क्या मैं अच्छी हूं?
हर लफ़्ज़ तुम्हारा दिल में रख लूं,
हर बात पे मुस्कान सजा लूं,
तुम्हारी ख़ुशी में ही जी लूं,
क्या बस इतना काफी है?
मैं अपनी बातों को रोक लूं,
तेरे जज़्बातों को ओढ़ लूं,
हर तकरार को चुपके से
आँखों से बूँदों में धो लूं...
अगर मेरी चुप्पी में तुम्हें सुकून मिले,
तो हाँ, शायद मैं अच्छी हूं।
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