।। अलकनंदा ।।
मैं अपने आप को सतोपंथ से आने वाली धारा मानता हुं,
मानता हुं इसलिए क्योंकि कई मीलों दूर अकेले चला हुं,
अकेले चला हुं इसलिए एक मरतबाह बाद तन्हा खड़ा हुं,
अलबत्ता आगे कई मोड़ पर कई नई धाराएं मेरा इंतज़ार करती हैं,
इंतज़ार करती हैं अपनी बाहे फैलाएं हुए,
इंतज़ार करती हैं मेरे अन्दर समा जाने के लिए,
इंतज़ार करती हैं अपना सब कुछ मुझे देने के लिए,
इंतज़ार करती हैं खुद को मेरा हिस्सा बनाने के लिए।।
- अदम्य -