नज़्म - तुझसे बिछड़ कर
मैं तुझसे बिछड़ कर भी तेरा ही रहा,
तेरी यादों में हर रोज़ जलता ही रहा।
जिस मोड़ पर तूने छोड़ा था मुझको,
मैं आज भी वहीं खड़ा सा रहा।
हवा ने कई बार तेरा पता माँगा,
मैं खामोश रहा, मगर रोता ही रहा।
तेरी हँसी की गूँज अब भी सुनाई देती है,
मैं भीड़ में होकर भी तन्हा ही रहा।
मैंने चाहा था ख़ुद को संभाल लूँ कभी,
पर ये दिल है कि बिखरता ही रहा।
कभी तेरा ज़िक्र किया चाँद से मैंने,
वो भी मेरी तरह बस जलता ही रहा।
लोग कहते हैं इश्क़ भूल जाने का नाम है,
तो फिर ये दिल तुझमें ही क्यों उलझा रहा?