गांव की शाम
सरिता के तट पर बहे पुरवाई,
बांसुरी बजाए मधुर शहनाई।
बटिया पे चलें पांव में छम-छम,
गांव की शाम लगे जैसे गज़ब।।
पीपल के नीचे बइठे दादा,
कहानी सुनाएं परियों वाला।
माई के हाथों की रोटी,
गुड़ के संग लगे मोती।।
बैल चलाएं खेतों में हल,
मिट्टी की खुशबू जैसे काजल।
मोर नाचे जब गिरें बदरिया,
प्रीत के गीत गाएं अटरिया।।
हंसी-ठिठोली, मीठी बोली,
गांव की गलियाँ लगें अनमोल।
चौपालों पे गूंजे बातें,
सपनों से भर जाए झोली।।
गांव की शाम लगे जैसे गज़ब,
मन में उठे स्नेह का राग