ज़िंदगी की कशमकश
चल रही है ज़िंदगी, एक अजीब से सफ़र में,
कभी हँसी के साए हैं, कभी आँधियाँ नज़र में।
कभी ख़्वाब ऊँचे, तो कभी टूटते देखे,
कभी अपने ही अपने से रूठते देखे।
रास्ते उलझे, मंज़िलें धुंधली,
कभी लगती पास, कभी लगती मुश्किलें दुगनी।
हर दिन नई परीक्षाएँ, हर मोड़ एक सवाल,
कभी जीत की ख़ुशी, कभी हार का मलाल।
रिश्ते भी बदलते, मौसम की तरह,
कभी धूप-छाँव, कभी सावन की तरह।
पर यही है ज़िंदगी, सीखने का नाम,
गिरकर संभलना, बढ़ते रहना सुबह-ओ-शाम।
हार नहीं मानेंगे, चलते रहेंगे,
ज़िंदगी की कशमकश में भी मुस्कुराते रहेंगे।