Hindi Quote in Poem by Dr Sandeep Singh

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छूटना

जब कुछ छूट जाता है,
तो लगता है, मानो आत्मा का एक हिस्सा
वहीं कहीं ठिठक कर रह गया हो।
वो लम्हे, जो साँसों में गुम्फित थे,
धीरे-धीरे स्मृतियों के कोहरे में घुल जाते हैं।
पर मन उन्हें छूने की कोशिश में,
हर बार खाली लौट आता है।

वो परिचित रास्ते अब अनजान लगते हैं,
और दीवारों का मौन बोलने लगता है।
जिन गलियों में कभी कदमों की गूँज थी,
अब वहाँ बस अजनबीपन की परछाइयाँ हैं।
लौटना चाहता हूँ, पर हर वापसी
एक और कदम पीछे ले जाती है,
मानो समय ने संबंधों के नक्शे से
मेरा नाम मिटा दिया हो।

दूरी केवल जगहों के बीच नहीं होती,
यह रिश्तों के भीतर भी उगती है।
धीरे-धीरे वो अपनापन घिसता है,
और एक अनकही दरार पनपती है,
जो कभी आवाज़ नहीं करती,
पर हर पल गहरी होती जाती है।

शब्द अब बेजान से लगते हैं,
भावनाएँ उनकी पकड़ से छूटने लगी हैं।
मन के भीतर जैसे कुछ टूटा तैर रहा है,
जो किनारे का रास्ता भूल चुका हो।
क्या छूटा है, क्या टूटा है,
इसका अहसास तो होता है,
पर उसे नाम देने की कोशिश
हर बार नाकाम हो जाती है।

कभी-कभी लगता है,
रिश्तों का सच यही है,
हर जुड़ाव में एक हल्की दरार छिपी होती है,
जो समय की चाल के साथ गहराती जाती है।
और हम बस अनदेखा करते जाते हैं,
जब तक कि वह दरार हमे पूरा न निगल लेl

Hindi Poem by Dr Sandeep Singh : 111954488
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