पुरुष सहज चरित्र हीन नही होते बशर्ते उन्हें किसी से प्रेम हो जाये । यदि वास्तविक रूप से पुरुष को प्रेम हो जाता है तो उसके चरित्र का पतन होना असंभव है...!
पुरुष तो स्वाभवतः ही प्रेमी होते है और उनकी सिर्फ एक ही मांग होती है । उस स्त्री के अधीन आकर अपना सर्वस्व समर्पण कर ठीक वैसे ही निश्चिंत हो जाएं जैसे एक अबोध बालक खेलते खेलते कहीं भी सो जाए लेकिन सुबह नींद अपनी माँ की आंचल तले ही खुलती है..।
पुरुष इस अवस्था मे आने की जिद में ही तमाम लड़ाई झगड़े खींच तान करता रहता है और ये कोशिश उसकी ताउम्र चलती है और इस कोशिश में असफल मर्द ही खींचा चला जाता है कहीं और ....!
और लग जाता है उसपर चरित्र हीन का लेबल कभी इस खोज को शारीरिक तो कभी मानसिक तो कभी इसे प्रेम का नाम दे देता है लेकिन वास्तविक रूप से वो एक डरता हुआ इंसान है जो सबकुछ हासिल कर के भी खुद को अपने उस स्त्री के बिना खाली हाथ समझता है और भटकता रहता है जाने कितने स्त्रियों के बीच सुकून की तलाश में ______!!