गजल पढ़ने आया, खुद गजल का पैमाना ही था,
सिर्फ अंदाज् बयाँ नही करते लहेजा भी वैसा था,
चहेरे को बक़्शे है हमने तो उसकी रूह का वास्ता मुजसे जो था,
बर्षो से जुदा पर अभी भी जुड़ा हुआ ये इश्क़ उम्र भर वाला ही था,
मौसम आये गए सब बारी बारी सताने आये मुझे अब तो,
बरसाती कहु या सुका हुआ गजल मे तो ताजा का ताजा ही था,
पाँव की आवाज छम छम सी आज भी गूंजती है हमारे कानों मे,
ये दिल के कोने मे धड़कता है आज भी वो शक्ष परवाना नही था ।
DEAR ZINDAGI 💕