Hindi Quote in Poem by Ram Pal Malhotra

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शाम के धुंधलके में
दूर क्षितिज के आखरी छोर पर
ढलते सूरज की लालिमा का
कुछ यूँ नजर आना
जैसे सरपट दौड़ते घोड़ों से
उठने वाले गुबार से
किसी अंगार का हो
ढक लिया जाना।


रोज उगना इस सूरज का
उषा की मोहक लालिमा लिए हुए
ऐसे जैसे कोई अबोध बच्चा
हो आकाश चूमने को आतुर
और फिर अंतरिक्ष में ठीक
शिखर पर ऐसा दहकना
कि कोई जुर्रत न कर पाए
देखने की आंख उठाकर,


और फिर ढल जाना,
थक कर उस लाल अंगार का,
गुम हो जाना दूर कहीं दूर
यहाँ गगन धरा को चूमे,
बिल्कुल वैसे ही जैसे
विधि निर्धारित जीवन का
पहिया अविरल घूमे,


भास्कर की तरह मानव भी
चमकता है दहकता है अपनी
शक्तियों के जलाल से,
और कभी ढक भी लिया जाता है
दुखों गमों के बादलों के जाल से,


वक्त ढलने के
तय है जैसे दिनकर का
निस्तेज और क्षीण हो जाना
ठीक वैसे ही तय है
हर जीव का ढलती उम्र में
शक्ति विहीन हो जाना
फिर जो उगा है वह
अस्त तो हर कोई होगा
है यह विधि का विधान
किसी को मिले चिता
तो कोई पहुंचे कब्रिस्तान,
और फिर वापस कौन योनि
कौन जगह कौन गांव
न कोई जाने न किसी को ज्ञान

बस ऐसा ही है मानव जीवन
आदित्य की मानिंद चढ़ना
बढ़ना ढलना और डूब जाना
पर इस कालचक्र का
कौन रचयिता कौन है चालक
किसी ने अब तक न जाना।
किसी ने अब तक न जाना।


आर पी मल्होत्रा

Hindi Poem by Ram Pal Malhotra : 111918453
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