भूलेंगे हम कैसे, वो जमाना बहार का ,
एक फूल जब खिला था, हमारे प्यार का।
मुद्दतों के गुजारिशों पे, लम्हों की मुलाकातें,
लेकिन गजब कशिश था, वो तेरे इंतज़ार का।
अरसा हुआ, खरा हूँ, जहाँ छोड़ तुम गये,
और क्य़ा यकीन दिलाऊँ , तुझपे ऐतबार का।
रिश्तों में बांधने का कोई शौक नहीं मुझे,
ख्वाहिश, दिल में रखूं, ना कि इख्तियार का।
मुझसे बिछड़ कर याद रहे, पछताओगे बहुत,
कौन रखता है जज़्बा, अब यूँ जाँनिसार का।
हमने भी सीखली है, अब रस्म -ए -इबादत,
जब जब उठें हैं हाथ, दुआ की तेरे दीदार का।
रमण बे-इल्म ©