ओ मनुष्य तू है कहाँ पर
तू निकल कर आ यहाँ पर,
कर ऐसा कर्म उन्नत
रह जायं तेरे चिह्न धरा पर।
लिख ऐसा गीत उन्नत
स्वर फूटें इस मही पर,
कदम अपने महान धर तू
अटल सत्य पर टिका रह तू।
अन्त तेरा अनन्त हो
हर दशा में वीरत्व ले तू,
फूल सा उच्छवास हो
बीज बनकर अनन्त रह तू।
दिख रहा शिखर जहाँ पर
तू वहाँ से निकल सरासर,
उठ रहा जो शोर यहाँ पर
तू उसी का लय हुआ कर।
** महेश रौतेला