Yug Mahiti 🌷🌹💐❤️🕉️🚩🏹⚔️🔱🦚 Sanatan Hindu Dharm Part-1.
काल तत्व और उसकी गणना जगत के रचयिता चतुर्मुख ब्रह्मदेव की उत्पत्ति में आरम्भ होती है। यह ज्ञान हमें वैदिक ग्रन्थ, सूर्य सिद्धान्त (१.१२ से १.२४ तक) और मनुस्मृति (१:६४ से १:७३ तक) से प्राप्त होता है।
तदनुसार,
◆ चतुर्मुख ब्रह्मदेव की आयु १०० वर्ष की है। उनके एक वर्ष में ३६० दिन होते हैं और उनकी आयु ३६० x १०० = ३६००० दिन है।
◆ चतुर्मुख ब्रहादेव का एक दिन एक कल्प है और एक रात एक (अल्प) प्रळय है। उनका एक दिवस = ४३२ करोड मनुष्य वर्ष (४.३२ बिलियन वर्ष)।
◆ हर एक कल्प के अन्त में अल्प प्रळय होता है, समस्तजगत अव्यक्त में हो जाता है (जैसे मनुष्य के सुषुप्ति में पूर्ण जगत समा जाता है)। पुनः अगले कल्प प्रारम्भ से नया जगत प्रकट होता है।
◆ चतुर्मुख ब्रह्मदेव की जीवक लीला की समाप्ति महाप्रलय कहलाती है जहाँ ब्रह्मा अन्तर्निहित
परब्रह्म में विलीन हो जाता है।
◆ यह अव्यक्त - व्यक्त का चक्र अनन्त है। अतएव, काल तत्व चक्राकार स्वरूप अपितु आज के वैज्ञानिक दृष्टि के अनुसार रेखीय नहीं है।
◆ चतुर्मुखब्रह्म देव का एक दिन (कल्प) हज़ार चतुर्युग है।
◆ एक हज़ार चतुर्युग को १४ मन्वन्तर में विभाजित किया जाता है। एक मन्वन्तर एक
मनु की आयु है जो मानवता के पूर्वपुरुष हैं।
◆ प्रत्येक मन्वन्तर के अन्तर्गत ७१ चतुर्युग / महायुग हैं। ब्रह्मदेव से उद्भवित मनु प्रत्क मन्वन्तर का शासन करते हैं।
◆ १४ मन्वन्तर से एक कल्प या ब्रह्मदेव का एक दिन होता है।
◆ ब्रह्मदेव का एक पूर्ण दिवस (१ कल्प+ १ प्रळय), १००० चतुर्युग का एक दिन (कल्प) और १००० चतुर्युग का एक रात (अल्प प्रळय) है। अतएव ब्रह्माजी का एक दिवस
२ x १००० चतुर्युग हैं।
◆ ऐसे ३६० दिन का एक वर्ष एवं १०० वर्ष आयु युक्त ब्रह्मदेव के मनुष्य वर्षों में ३११.०४ ट्रिलियन वर्ष हैं। यह काल संख्या एक सृष्टि है। इस ब्रह्मदेव की आयु की आधी मात्रा को एक परार्ध कहते हैं।
◆ अभी हम ब्रह्माजी के ५१वें वर्ष के प्रथम दिन में हैं। इस १००० चतुर्युग मनुष्य वर्षीय
ब्रह्माजी के प्रथम दिन का नाम श्वेतवराह कल्प है।
◆ जैसा पहले देखा गया, यह १००० चतुर्युग मनुष्य वर्षीय ब्रह्माजी के दिन को १४ मनु में विभाजित, यह सातवें मनु द्वारा शासित, ७१वीं चतुर्युग के अन्तर्गत, वैवस्वत मन्वन्तर है।
◆ इस ७१ चतुर्युग के अन्तर्गत वैवस्वत मन्वन्तर में वर्तमान काल, २८ वाँ चतुर्युग है।
◆ हर एक युग में ६० वर्ष की कैलेंडर प्रणाली है।
◆ कलियुग के ४,३२,००० वर्षों को, पूर्वोक्त सूची क्रम के अनुसार (४,३२,०००/६०) ७,२०० संवत्सर को एक कलि के नाम से जाना जाता है। तत्स्वरूप, द्वापर युग में १४,४०० (७, २०० x २) संवत्सर होते हैं। इस तरह हर युग की गणना होती है।