Hindi Quote in Motivational by Dr Jaya Shankar Shukla

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इलावृत वर्ष
पुराणों के अनुसार इलावृत चतुरस्र है. वर्तमान भूगोल के अनुसार पामीर प्रदेश का मान 150X150 मील है अतः चतुरस्र होने के कारण यह 'पामीर' ही इलावृत है. इलावृत से ही ऐरल सागर, ईरान आदि क्षेत्र प्रभावित हैं.
आज के किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, मंगोलिया, तिब्बत, रशिया और चीन के कुछ हिस्से को मिलाकर इलावृत बनता है. मूलत: यह प्राचीन मंगोलिया और तिब्बत का क्षेत्र है. एक समय किर्गिस्तान और तजाकिस्तान रशिया के ही क्षेत्र हुआ करते थे. सोवियत संघ के विघटन के बाद ये क्षेत्र स्वतंत्र देश बन गए.
आज यह देश मंगोलिया में 'अतलाई' नाम से जाना जाता है. 'अतलाई' शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है. सम्राट ययाति के वंशज क्षत्रियों का संघ भारतवर्ष से जाकर उस इलावृत देश में बस गया था. उस इलावृत देश में बसने के कारण क्षत्रिय ऐलावत (अहलावत) कहलाने लगे.
इस देश का नाम महाभारतकाल में ‘इलावृत’ ही था. जैसा कि महाभारत में लिखा है कि श्रीकृष्णजी उत्तर की ओर कई देशों पर विजय प्राप्त करके ‘इलावृत’ देश में पहुंचे. इस स्थान को देवताओं का निवास-स्थान माना जाता है. भगवान श्रीकृष्ण ने देवताओं से ‘इलावृत’ को जीतकर वहां से भेंट ग्रहण की.
हिरन्यमय वर्ष
इस वर्ष की स्थिति श्वेत पर्वत के उत्तर में तथा श्रुंगवान पर्वत के दक्षिण में है. यहीं पर हिरण्यवति नदी प्रवाहित होती है. यहां के लोग भगवान कच्छ की उपासना करते थे
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रम्यक वर्ष
वायुपुराण नीलपर्वत के बाद रम्यकवर्ष का होना बतलाता है. यह प्रदेश यूराल पर्वत की तराई होने के कारण सुन्दर है तथा पहाड़ी प्रदेश यहाँ बहुत कम है. बहुत सम्भव है, इस रम्यक-भूमि के उत्तर यूराल की पर्वतश्रेणी में कोई श्वेतपर्वत भी रहा हो.
इस प्रदेश में मनु को भगवान के मत्स्यावतार के दर्शन हुए थे.
भद्राश्व वर्ष
यह प्रदेश इलावृत के पूर्व में है । बीचमें माल्यवान पर्वत है. यहां के निवासी हयग्रीव की उपासना करते थे.
केतुमाल वर्ष
इलावृत के पश्चिम में केतुमल वर्ष है. दोनो के बीच गन्धमादन पर्वत ( हिन्दुकुश की ख्वाजा महम्मद श्रेणी) है. उत्तर में नील पर्वत ( जरफ्शान-ट्रान्स- अलाई-तियानशान ) है तथा पश्चिम में पश्चिम सागर ( केस्पियन सी ) है.
हरि वर्ष
इस की स्थिति इलावृत के दक्षिण में है, यहां के निवासी भगवान नरसिंह की उपासना करते थे.
किंपुरुष वर्ष
इस प्रदेश की स्थिति उत्तर में हेमकुट (लड्डाख-कैलाश श्रेणी) तथा दक्षिण में हिमालय तक है. यहां के निवासी राम की उपासना करते थे.
भारत वर्ष
इसका वर्णन करने की जरूरत नही है, हम सब इस में तो रहते हैं.
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Hindi Motivational by Dr Jaya Shankar Shukla : 111801023
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