नज़रिया
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मेरे ज़िंदा रहने का नज़रिया कुछ और है
और मरने का भी
नहीं चाहती बड़े-बड़े तमगों से लैस शरीर मेरा
न सह पाने की स्थिति में हो जाए शिथिल
न ही चाहती हूँ अहंकार का चोला पहन
इतनी भारी हो जाऊँ कि एक स्मित भी
मुझे बना दे अजनबी
मेरी रूह में भरे रहें बद्दुआओं के ज़खीरे
घिरी रहूँ झूठी तालियों से
पीठ पीछे मोटी गलियों से
मंद हास की चुटकी भर मुस्कान से
खिला रहे चेहरा ----
कोई न हो आवरण ,न ही पहरा
नूर बरसता रहे आँखों से
नेह पसरता रहे बातों से
मेरे लिए सब हों अपने
न टूटे-फूटें किसीके सपने
फहरा सकूँ एक ऐसी ध्वजा
जिस पर लिखा हो प्रेम,स्नेह
चुटकी भर स्मित झरती रहे
रोटी सबको मिलती रहे
अवशेष का क्या है
कर देना देह-दान
किसीका तो हो कल्याण
कुछ काम आ सकूँ किसीके
स्वर्ग पा सकूँ यहीं ----
स्नेह के पुष्प खिला जाऊँ
शायद ,तभी जाने के बाद
किसीको याद भी आ पाऊँ ----
जीजिविषा नहीं होती समाप्त कभी
ज़रूरी भी है ,दिनों को गुज़ारने के लिए
स्नेहपूर्ण ज़िंदगी संवारने के लिए
थोथा चना ,बाजे घना न बन जाऊँ
हवाओं में एक गीत सा बन
ज़िंदगी का गीत गुनगुना जाऊँ----
डॉ.प्रणव भारती