इंसान का शरीर।
मूड़ खराब है
भेजा खराब हो रखा है।
बाल ऐसे ही सफेद नही हुए है हमारे।
आंखे लाल हो रखी है।
नाक चढ़ाए हुए।
दांत किटकिताता हुआ।
हृदय में अनंत बातो का सागर फैला है।
जिसमे मैला कुचैला विसैला सब कुछ है।
गले से किसी की प्रशंशा नही उतारी जाती है।
कंधो में भार अधिक है।
भुजा में बल नही है परंतु लड़ने को तत्पर है।
हृदय पर आघात और दिल का टूट जाना अक्सर देखा गया है।
पेट में कुछ वैसे भी नही पचता और किसी की बात तो बिलकुल नहीं।
मन जब तक किसी को दूसरे के सामने नीचा न दिखा ले। तब तक अमन नही मिलता है।
निगाहे गलत देखना छोड़ती नही। इसलिए चस्मा का नंबर भी बदलता रहता है।
ढांचा हिल गया है।
गुर्दे छिल गए हैं।
मुंह फूला है।
ध्यान कही नही है।
दिखावे के चक्कर मे क्या क्या दिखा दिया।
टांगे भर आती है।
आंसू रुकते नहीं।
खाले झूल गई।
उम्र ढल गई।
दिमाग अब चल नही रहा है।
बस अब और नही
ख़तम।
आनंद।