बैठी रहती हूँ ख्यालो में तेरे
कब शाम ढल जाती है
पता ही नही चलता
चुभन सी महसूस होती है सीने में
दिल का कोई दर्द है या कमी तुम्हारी
पता ही नही चलता
आँखों में आते आंसू तो रोक लेती हूँ
पर दिल दिमाग से तेरे ख्याल कैसे रोकू
पता ही नही चलता
यू तो हंसती खेलती रहती हूँ सामने सब के
अकेले में ये उदासी न जाने कहा से आ जाती है
पता ही नही चलता
जिदंगी तुम्हारे संग बीताने का सपना तो नहीं
पर तुम्हें किसी और के साथ देख क्यूँ नही पाती
पता ही नही चलता