साथियों
स्नेहपूर्ण नमस्कार
आज एक दुखद सूचना प्राप्त हुई | मन दुखी हुआ लेकिन आने के साथ जाने का गठजोड़ है | अत : हार्दिक श्रद्धांजलि आ. किशोर काबरा जी को |
राजस्थान के धरती-पुत्र ,गुजरात को कर्म-भूमि बनाने वाले डॉ किशोर काबरा ने न जाने कितने शिष्यों को छंद ज्ञान सिखाया | आज उनका देह-त्याग उनके सभी शिष्यों के लिए पीड़ादायक है |
उनको मुझसे शिकायत रही कि मैंने उन्हें गुरु स्वीकार नहीं किया लेकिन वे मुझे सदा स्नेह देते रहे ,मेरी रचनाओं के लिए ,मेरी वंदनाओं के लिए सदा आशीष देते रहे |
हाँ,मेरे मैडिटेशन गुरु बने वे और एक बार न जाने ज़मीन से कितनी हज़ार की ऊँचाई पर उनके साथ जो मैडिटेशन हुआ ,वह मेरे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है | इसका संस्मरण मैंने बहुत पहले 'उजाले की ओर 'श्रंखला में प्रस्तुत किया है |
आध्यात्म की ओर अग्रसर वे मुझे 'ॐ प्रणवाय नम:' कहते | मैं खूब ज़ोर से हँस पड़ती |
अनेकों पुस्तकों के रचयिता डॉ काबरा का जाना निश्चय ही साहित्य जगत के लिए ,विशेषकर उनसे छंद-ज्ञान लेने वालों के लिए आपूरणीय क्षति है |
उनकी ही पंक्तियों से मैं उन्हें बनब करती हूँ |
अब तक लिखता रहा वही सब ,जो कुछ मन करता है |
मन के बारे में लिखने को अब कुछ मन करता है ||
सादर नमन
डॉ. प्रणव भारती