यादें हैं दिल में
पर घर में आहट नही
बस एक तू हो सामने
और कोई मेरी चाहत नही
ना दिन को चैन है
ना नींद आती है रातों में
खोया खोया रहता हूं
ना जी लगता है बातों में
बेक़रारी है हर दम
एक पल की भी राहत नही
बस एक तू हो सामने
और कोई मेरी चाहत नही
बादलों में छुपकर कहीं
नग्मे तू सुनाती है
हाथ अगर बढाऊं तो
पल में बिखर जाती है
पुकारता हूँ फिर एक बार
इस बार कोई शरारत नही
बस एक तू हो सामने
और कोई मेरी चाहत नही
ख्वाबों में आती है
कभी हकीकत में दिख जा
तकदीर में मेरी
तू अपने आप को लिख जा
एक वादा ही कर दे
जरूरत-ए-दस्तख़त नही
बस एक तू हो सामने
और कोई मेरी चाहत नही