उलझे धागे।
व्यक्ति को उलझा हुआ नही सुलझा हुआ होना चाहिए।
लेकिन जब तक उलझेगा नही तब तक सुलझेगा नही।
इसलिए व्यक्ति को उलझा हुआ होना चाहिए।
कहा जाता है की हमेशा उलझे धागे को लोग प्रायः आवेश में आकर तोड़ देते है।
हालाकि उसकी जगह कुछ लोग ऐसे भी जो उसको उलझनों में भी नया एक मोड़ देते है।
जानते है की उलझा है बहुत ज्यादा अभी वो खुल नही सकता।
मगर कोशिश बेचारी हार को स्वीकार कर ले क्या।
मगर कैसा रहेगा उलझ कर सुलझा न जाए तो।
क्या मन को मारकर के बैठना कोई बात होती है?
ना जाने कैसे कैसे कीचड़ो में गंध होती है।
कमल न चाहकर भी उस सड़े कीचड़ में खिलता है।
मगर इस हाल पर भी देखकर के दंग है वो लोग।
जिनको हर कदम पर मखमली आराम मिलता है।
बहुत है इस धरा पर उलझ कर के सुलझने वाले
तुम्हें उलझन नही होती अगर तो तुम सुलझ जाते।
वो धागा ही क्या जो उलझे न बुनते वक्त
उलझ करके ही वो फिर से किसी के तन को ढकता है।
तुलसी,मीर,मीरा की सभी की अपनी गाथा है।
उलझ कर के जो सुलझा हो वोही बस मोक्ष पाता है।
चलो माना निगाहों में निगाहों का उलझना है बात ही कुछ और
मगर आंखो में फसकर के कोई बाहर नहीं निकाला
अगर निकला कोई तो वो है उसकी आंख का आंसू
जो विरहा में किसी के आंखरी सांसों में रोता है।
उलझकर के ये दुनिया आज तक सुलझी कहां है।
बात आंखो की हो तो फिर ये सुलझी कहां है।
तुम्हारी इन दो आंखो में ही तो सारा जहां है।
आनंद त्रिपाठी
लेखक।