आधुनिकता के इस दौर में ..।
तेजी से बदलती जिंदगी की
खुआइसे..।
आज लोग एक नई धुन में बढ़ते जा
रहे हैं आगे..।
कुछ नए की खोज में..।
वो गांव की हर चीज़ ओर हर बन्धन
से निकले के लिए मतवाले हो रहे है..।
शहर पहुँच कर फिर गांव की जिंदगी जीने
के सपने सजा रहे हैं..।
गांव के वो लोग जो हर सुख दुख में साथ देते..।
शहर में आते ही लोग किसी से किसी का मतलब
नही राख रहें हैं।
गांव की वह पेड़ो की शीतल व्यार , यहाँ कूलर
पंखों ने समेट ली है।
गांव के वो त्यौहार जहाँ, सब और पूरा गांव साथ मिलके बनाते।
यहाँ लोग तो अपने रिश्तेदारों को भी नहीं बुलाते..।
यहाँ सारी सुख सुविधाएं तो मिल रहीं हैं, पर
आनंद नही।
आधुनिकरण और शहरिकरण ने हमारा जीवन
इस तरह अपनी तरफ मोडा है कि हम इसको नहीं अपनाए व हम यहां नहीं पहुँचे ..।
तो हम कुछ नाही कर सकते हैं और नाहि बन सकते है।
गांव की उन गलियो में मस्त होकर
गुजरा था बचपन , जब बड़े हुए तो गांव
से चिढ़ होने लगी, जब पहुँचे
जाके शहर तब , जाने मर्म जाने गांव का..।
हर सुविधा होने के बाबजूद भी,
कुछ अजीब सी कमी लगती है,
अब न जाने कब गांव की कौन सी गली
आवाज देती है।
वयस्त हुआ जीवन इतना, कि भूल गए
हम गांव अपना ..।