न दूर तक चलने की जिद है , न जीत हार की फिक्र , बची है कुछ कसक किन्तु न कुछ पाने की लालसा जा रहा है धीरे -धीरे खोने का भय भी जो है, हो रहा है स्वंय ही स्वतः ही , क्यों?क्या? कैसे ? से शायद बाहर निकल रही हूँ | मै बस चल रही हूँ ! बस चल रही हूँ |
नमो भगवते वासुदेवाय !
सुप्रभात 🙏
-Ruchi Dixit