दर्द का बाशिंदा हु,खुशी की चाहत है
जाना है उस नगरी,जहाँ ना कोई हताश है
यहाँ हर कोई उदास ,हर कोई आहत है
मुझे जाना है उस गली जहाँ बस राहत है
कच्ची पगडंडी के रस्ते... दूर तलक
जहाँ मिले जमी से फलक
यहाँ है बंदिशो की बेड़ियाँ और मोह माया
जाना है वहाँ जहाँ हो खुद का वज़ूद और सुकून की छाया
जहाँ तराश पाऊ खुद को... खोज लू अपनी पहचान
क्या यह वही जगह है?
जिसे कहते है लोग श्मशान...
नहीं इतना छोटा मेरा आसमान हो नहीं सकता
जहाँ पा लु मैं खुद को... वो तो श्मशान हो नहीं सकता
टूटे पंखों और राख हुए हौसलो से असली उड़ान अभी बाकी है
तु लाख ले ले इंतकाम ऐ जिन्दगी
पर मेरे हौसलो का इंतिहान अभी बाकी है