भगवान श्रीराम का शब्दावतार ‘श्रीरामचरितमानस’!!!!!!
रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥
मन करि बिषय अनल बन जरई। होई सुखी जौं एहिं सर परई॥
भावार्थ- इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके सुनते ही कानों को शांति मिलती है। मनरूपी हाथी विषयरूपी दावानल में जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानस रूपी सरोवर में आ पड़े तो सुखी हो जाए।
त्रेतायुग में आदिकवि हुए ‘वाल्मीकि’ और आदिकाव्य हुआ उनके द्वारा रचित ‘रामायण’ । परन्तु संस्कृत भाषा में होने के कारण वह महाकाव्य जन-जन तक नहीं पहुंच पाया । भगवत्कृपा से कलियुग में वही वाल्मीकिजी गोस्वामी तुलसीदासजी के रूप में प्रकट हुए जिन्होंने सरल व सरस हिन्दी-अवधी मिश्रित भाषा में ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना की ।
भगवान श्रीराम का शब्दावतार है श्रीरामचरितमानस!
गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस कोई साधारण ग्रन्थ, उपन्यास या किताब नहीं है वरन् श्रीरामचरितमानस का प्रत्येक दोहा, प्रत्येक सोरठा, प्रत्येक श्लोक, प्रत्येक छन्द और प्रत्येक शब्द साक्षात् वेद के समान है । श्रीरामचरितमानस परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीराम का वांग्मयस्वरूप है । यह दिव्य ग्रन्थ समस्त वेद, शास्त्र, पुराण और उपनिषदों का सार है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी को भगवान शंकर, मारुतिनंदन हनुमान, पराम्बा पार्वतीजी, परब्रह्म भगवान श्रीराम और शेषावतार लक्ष्मणजी ने समय-समय पर अपना दर्शन देकर श्रीरामचरितमानस उनसे लिखवाया और भगवान श्रीराम ने ‘शब्दावतार’ के रूप में श्रीरामचरितमानस में प्रवेश किया । इसीलिए यह मनुष्य को सच्ची चेतना देने वाला और पग-पग पर पथ-प्रदर्शन करने वाला लोकमंगल ग्रन्थ माना गया है ।
भगवान शंकर व श्रीराम की कृपा से लिखा गया श्रीरामचरितमानस!!!!!!
हनुमानजी की कृपा से तुलसीदासजी को श्रीराम के दर्शन हुए । भगवान राम-लक्ष्मण उन्हें दर्शन देने के लिए घोड़ों पर सवार होकर राजकुमार के वेश में आए परन्तु तुलसीदासजी उन्हें पहचान नहीं पाए । दूसरी बार संवत् १६०७, मौनी अमावस्या, बुधवार के दिन प्रात:काल गोस्वामी तुलसीदासजी चित्रकूट के रामघाट पर पूजा के लिए चंदन घिस रहे थे, तब भगवान राम और लक्ष्मण ने आकर उनसे तिलक लगाने के लिए कहा । हनुमानजी ने सोचा कि ये शायद प्रभु श्रीराम-लक्ष्मण को न पहचानें, इसलिए तोते का रूप धरकर चेतावनी का दोहा पड़ने लगे—
चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर ।
तुलसिदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर ।।
भगवान श्रीराम की अद्भुत छवि देखकर तुलसीदासजी अपनी सुध-बुध भूल गए । तब भगवान श्रीराम ने अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने व तुलसीदासजी के तिलक किया और अन्तर्ध्यान हो गए । तुलसीदासजी सारा दिन बेसुध पड़े रहे, तब रात्रि में आकर हनुमानजी ने उन्हें जगाया और उनकी दशा सामान्य की ।