मानो तो मैं गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी, मेरी लहर लहर में लिखी है ऋषियों की अमर कहानी, कोई यज़ु करें मेरे जल से, कोई मुर्त को नहलाए, कहीं मोची चमड़ा धोए, कहीं पंडित प्यास बुझाए➖यह धर्म-कर्म के झगड़े, इंसान की है नादानी, मानो तो मैं गंगा मां हूं ना मानो तो बहता पानी➖ ब्रह्मदत्त,
➖ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़
पानी तेरा रूप है एक है, नाम तेरे बहुत अनेकों अनेक, शांत तेरे रूप को नाम मिले हैं नेक... कहीं है गंगा, कहीं हैं जमुना, कहीं हैं सरस्वती के किस्से अनेक ➖ ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़
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पानी तेरे रूप हजार ➖ ब्रह्मदत्त त्यागी
पानी तेरे रूप हजार, कहीं बने तू जीवन, कहीं बने आजार
किसी के मस्तिक पर पसीना बनकर ठहरे तू, विपत्ति बने तो (बाढ़)विचार, कहीं बना जीवन व्यक्ति का, कहीं मौत लाचर... पानी तेरे रूप हजार, यही सोचते हैं हम सब, और यही करें विचार, ब्रह्मदत्त करें बार-बार, पानी तेरा जिक्र सरे बाजार...
पानी आकाश से गिरे तो........बारिश, बने
आकाश की ओर उठे तो........भाप, बने
अगर जम कर गिरे तो...........ओले, बने
अगर गिर कर जमे तो...........बर्फ, बने
फूल पर हो तो......ओस, बने
फूल से निकले तो.........इत्र बने
जमा हो जाए तो.... .....झील, बने
बहने लगे तो........नदी, बने
सीमाओं में रहे तो.. .जीवन, बने
सीमाएं तोड़ दे तो..........प्रलय बने
आँख से निकले तो........ आँसू, बने
शरीर से निकले तो..............पसीना, बने
और.... प्रभु के चरणों को छू कर निकले
तो..........चरणामृत' बने
इसी तरह तेरे रूप के हैं, न जाने कितने आचार, बहुत सोचकर बहुत समझकर तेरे ऊपर सर्च किया यह, वाकई है तू करने लायक अद्भुत अवश्य विचार... तू जीवन और मृत्यु का लगता है संचार......... पानी तेरे रूप हजार तू जग का है पालनकर्ता, तू है पालनहार , तू संसार विध्वंस का लगता है आधार
ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़