Hindi Quote in Religious by Anjana Vyas

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एक बार अर्जुन को अपनी भक्ति पर बड़ा अभिमान हो गया था। उसने श्री कृष्ण को भी यह बताया कि वह उनके प्रमुख भक्तों में से एक है ।भगवान श्रीकृष्ण सिर्फ मुस्कुरा दिए ।भगवान कृष्ण और अर्जुन एक दिन शाम को टहल रहे थे ,थोड़ी देर बाद अर्जुन ने महल की ओर जाने की आज्ञा मांगी और उस तरफ मुड़ा रास्ते में उसने एक ब्राह्मण देवता को देखा जो कि हाथ में नंगी तलवार लिए रक्तिम आंखों से क्रोध उगल रहे थे। अर्जुन विस्मित सा-देखने लगा ।अर्जुन ने उनसे पूछा कि आपका यह रौद्र रूप क्यों है? तो ब्राह्मण देवता ने कहा मेरे चार प्रबल शत्रु है जिन्हें मार कर ही मैं शांत हो सकता हूं ।अर्जुन ने धैर्य पूर्वक पूछा द्विजराज कौन है आपके वे प्रबल शत्रु जिन्हें आप मारना चाहते हैं? ब्राह्मण देवता ने कहा मेरा प्रथम शत्रु है वह भक्त प्रहलाद जिसके कारण मेरे सौम्य मूर्ति प्रभु को ऐसा रौद्र रूप धारण करना पड़ा ।मेरे दूसरे शत्रु है देवर्षि नारद, जो मेरे प्रभु को सोने नहीं देते हर क्षण नारायण नारायण पुकारते रहते हैं। मेरी तीसरी शत्रु है द्रुपद सुता द्रौपदी जिसके कारण मेरे प्रभु को एक दिन भूखा रहना पड़ा। अर्जुन ने कांपते स्वर से पूछा प्रभु आप का चौथा शत्रु कौन है? ब्राह्मण देवता ने क्रोध से कांपते हुए स्वर में कहा मेरा चौथा प्रबल शत्रु है वह कुंती पुत्र अर्जुन !अर्जुन भयाक्रांत सा हो गया उसे लगा बस अब अगले क्षण मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है ।फिर भी वह थोड़ा संयत होकर बोला विप्रवर अर्जुन का क्या अपराध था ?ब्राह्मण ने बोला अर्जुन का दुस्साहस तो देखो उसने मेरे प्रभु को अपना सारथी बना लिया ?अर्जुन देख रहा था और स्वयं की भक्ति की महानता का स्तर तथा ब्राह्मण देवता की ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा सरलता और सहजता को देखकर लज्जित हो रहा था ।अर्जुन द्वारिकाधीश के पास जाकर उनके चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगी और यह मान लिया उनसे भी श्रेष्ठ उनके कई भक्त हैं।

Hindi Religious by Anjana Vyas : 111783738
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