शीर्षक: अपनी ही फिक्र कर
सच्ची मोहब्बत जहाँ में मिलनी कहाँ आसान होती
कुछ कहानियाँ ही उनकी अब किताबों में मिलती
हीर-रांझा, शीरी-फरियाद भूले हुए किस्से हो गये
मकसद मोहब्बत के कागजी बदरंगी फूल हो गये
प्यार अब जिस्म के मिलन का खिलौन भर रह गया
दावा पाक मोहब्बत का जिस्म के बाजार में बिक गया
रुसवाइयों के बाजार में सब कुछ बदला हुआ लगता
रुतबा दिल का नाकामी का टँगा हुआ औजार लगता
गली कूंचों में प्यार के हजारों इश्तहार छाये रहते है
मायूसियों के फंदे में मरे हुए इश्क के साये दिखते है
"कमल" दौर सिर्फ प्यार का मोहब्बत की बात न कर
चाहतों के आशियाने में जायज है अपनी ही फिक्र कर
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali