महामृत्युंजय मंत्र का संपूर्ण अर्थ-ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़
सभी शिव भक्तों को शुभ सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ एवं समस्त दोस्तों मित्रों साथियों की तरफ से आओ स्तुति करें महामृत्युंजय मंत्र की संपूर्ण जानकारी के साथ...........ब्रह्मदत्त
||महामृत्युंजय मंत्र।।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
अर्थः
हमारे पूजनीय भगवान शिव के तीन नेत्र हैं, जो
प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं,
जिनकी शक्ति से सम्पूर्ण विश्व का पालन-पोषण हो
रहा है. हम उनसे प्रार्थना करते हैं कि वह हमें मृत्यु
के बंधनों से मुक्त करें ताकि प्राणी को मोक्ष की
प्राप्ति हो.
जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने
के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त
हो जाती है. उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी
बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों
से सदा के लिए मुक्त हो जाएं तथा आपके चरणों
की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को
त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं.
महामृत्युंजय मंत्र को काल को टालने वाला मंत्र
कहा गया है. जब यमदूत मृकण्ड ऋषि के पुत्र
मार्कण्डेय के पास आए तो वह इस मंत्र का पाठ
कर रहे थे. काल को हिम्मत नहीं हुई कि वह
महाकाल के उपासक को छू सके और उनकी मृत्यु
टल गई.
ऋषि-मुनियों ने महामृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय
कहा है. चिंतन और ध्यान के लिए प्रयोग किए
जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस
मंत्र का सर्वोच्च स्थान है.।।
इति संपूर्णम्।।
प्रस्तुतकर्ता ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़