कभी बन के लोरी तो कभी किरणों की फुहार आती है
तेरी यादे ही सुलाती है मुजे तेरी याद ही मुजे जगा जाती है
एक चाँद निकलता है घने अंधेरो के बीच मे से
सुबह अभी गुज़री नही होती के रात आ जाती है
मौसम के बहाव मे, चांदनी की छाव में बैठे है हम
आंख उठा केे देखा नही चाँद को के तेरी याद आ जाती है
तुजसे मिलने का मन बना ही रहे होते है हम
एक ठंडी हवा की लहर हमे गले से लगा जाती है
दर्द एक ऐसा है जो कभी भुलाने से भी नही भूलता
अल्फ़ाज़, आंसू का बहते ही हाथों में शराब आ जाती है
ALFAAZ....✍✍✍