Hindi Quote in Thought by Lalit Rathod

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क्या हम लोग एक-दूसरे को इतना भी नहीं जानते कि एक-दूसरे के दुःख सूंघ सके? मैं रात के सपने झूठे ही सही पर उन्हें अपनी पूरी शिद्दत से देखता था। हम दोनों के बीच में बड़ा अंतर सपनों का ही था। उसे अधूरेपन की आदत थी और मैं अपने देखे हर सपने को उसकी नियति तक पहुंचना चाहता था। लेकिन कब है पता नहीं मैंने खुद को अधूरेपन में शामिल कर लिया। इसमें बने रहने मैंने जीवन के यात्राओं के द्वार हमेंशा के लिए खोल दिए। अब अधूरापन कहीं सड़को में चलता हुआ मिल जाता है तो कभी पास बैठकर भीतर चल रहे संवादों में शब्द पैदा करता है। उसे महसूस करने आंख बंद करते ही वह नाचने लगता है। मानों अधूरापन यात्रा में होने का जश्न पूरी शिद्दत से माना रहा है, जिसे मैंने अपने सपने में देखा है। लेकिन अब मैं उसकी नियति पर पहुंचना नहीं चाहता। बस यात्राओं में बने रहना चाहता हूं। यात्रा के उथल-कूद के बाद दोनों एक साथ घर लौटते है बिना उसके नियति जाने।

Hindi Thought by Lalit Rathod : 111776668
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