ज़िंदगी झौंका हवा का
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ज़िंदगी झौंका हवा.का प्यार का संगीत है
ज़िंदगी खुशियों की महफ़िल गा सकें तो गीत है
हर नई रौशन सुबह से अपने दिल कर लें जवाँँ
जिंदगी है एक दरिया जिंदगी है आसमां
जिंदगी सपना सुखद है ज़िंदगी ही प्रीत है
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मुश्किलें आएं भी तो क्या ये कदम बढ़ते रहें
प्यार के सारे तराने साथ ही चलते रहें
ज़िंदगी तन्हाई है लेकिन मिलन की जीत है
सुप्त साँसों को खिला, भरती सदा संगीत है
ज़िंदगी खुशियों की महफ़िल गा सकें तो गीत है।
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रेशमी रिश्तों. में जब भी कुछ तपन भरने लगे
अश्क आँखों में भरे पलकों में आँसू भर उठें
ज़िदगी नज़दीक आ आगोश में भरती. कभी
और फिर इन दूरियों को दूर कर देती तभी
शुक्रिया ए ज़िंदगी तू ही दमकती प्रीत हैज़िंदगी...।।....
डॉ.प्रणव भारती
से संबोधन तक -------------------------
संबंधों से संबोधन तक गिरह न जाने कितनी भीतर और दंश चुभते हैं मन में ,मन हो जाता है ज्यों बेघर सन्नाटे आवाज़ लगाते , जीने-मरने की कोशिश में और कमलिनी रूठ गई है ,अंधियारे के उस झुरमुट में
मन की गति हुई लंगड़ी है,चार कदम भी चल न पाती टूटे दंशों की स्मृति से हर पल जाने क्यों टकराती जितनी बार पृष्ठ पलटे हैं पीड़ा बढ़ती ही जाती है कहाँ कोई सुन पाता मन को प्रस्तर प्रतिमा बन जाती है
श्वासों की गति थिरक रही है ,जाने किसकी करे प्रतीक्षा और स्वयं मन के द्वारे पर खड़ा हुआ 'मैं' लेकर भिक्षा साथ भले ही मत देना तुम यूँ पर बेचारा मत कर जाना माटी का तन टूटा -बिखरा किरचों को किसने पहचाना
शाश्वत सौगंधों की बातें हो जाएँगी तीतर-बितर यूँ आने वाले कल की झोली ,कोई यहाँ न भर पाएगा मखमल के पैबंद लगे हों बेशक रेशम की पोशाकें मन के भीतर का कोना बस,अँधकार में रह जाएगा |
डॉ.प्रणव भारती