शिर्षक : हम कहाँ जा रहे है ?
सबके अधरों पर मुस्कानों की बहार हो
हर दिल में सिर्फ, एक प्यार ही प्यार हो
ऐसा दिन आये, जिसमें स्नेह भरपूर हो
उस दिन इंसान में, देवता का अवतार हो
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आज हिंसा की बड़ी तूफानी हवाएं बह रही है
बदलती इंसानी आदतें दानवी कहर ढा रही है
आधुनिकता की दौड़ में मंजिले भटका रही है
अर्थ की पूजा में सँस्कारो की बलि चढ़ रही है
शिक्षा के बदलते आधार में बचपन जा रहा है
समय से पहले जवानी का जलवा बिखर रहा है
अंतरँगी रिश्तों को ऐतबार का बुखार सता रहा है
सेवा धर्म है, ये इश्तहार, बाजार में खूब बिक रहा है
शादी बंधन प्यार का, किस्सों में अच्छा लगता है
हक़ीक़क्त में घर के अंधेरों में, जुगनू बन रहता है
बच्चे आज भी भविष्य, अगर सब कुछ सही होता है
बढ़ते हुए गुनाहगारों से, इतिहास भी शर्मिंदा होता है
मान-सम्मान का सूर्य अब उजालों का मोहताज है
प्रतिष्ठाओं के सितारों में न चमकने वाला अंदाज है
चाँदनी जल रही है, अब ऐसी खबरों का रिवाज है
हम कहाँ जा रहे है ? अब ये, एक अंतिम ही राज है
✍️ कमल भंसाली