शीर्षक: प्रेम- सम्बन्ध (Relationship)
जिंदगी रास न आती थी, जिनके बिना
दावा आज वो करते, रह लेंगे, तुम बिना
हादसों का शहर में, प्यार की जरुरत नहीं
संभल के चलो, शहर की जिम्मरदारी नहीं
जरुरत के रिश्तों में, सब कुछ जायज होता
इतफाक से जुड़े में, टूटने का तो डर ही होता
मधुरता का सफर जब, तूँ, से मैं तक पँहुच जाता
माफ करना, वहीं, सफर का साथ अंतिम ही होता
खुद का ख्याल भी, जब अपना नहीं हो सकता
गैरो का अपना मानना, कैसे जायज हो सकता ?
पथ के दावेदार बन, साथ-साथ जो आशियाना बनाते
समझे वे, चाँद-चाँदनी की तरह एक दूजे के लिऐ होते
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali