मन से बाहर क्या जाना है
सब कुछ मन में रह जाना है।
एक बात जो थी मन में अटकी
बस यह कहते ही मर जाना है
मन से बाहर ...
एक क्षण में ही सतरंगी बन जाते हो
हे मन कैसे हो इतने प्रबल दृढ़ी
सब कुछ तो मिट जाता है। बस मन का मैल नही मिटता
ऐसे तुम कितनो के ऋणी।
मन ने मनु से मन मंतर तक सबको तोड़ा मैने माना
मन से बाहर क्या जाना
भीतर इतना कोलाहल और बाहर की अतिशय गरिमा
मन तेरी इतनी चर्चा इतनी हिम्मत इतनी महिमा।
वशीकरण का मंत्र है तुझमें मार करादे एक दाना
मन से बाहर क्या जाना....
सब कुछ भीतर ही पाना।