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*न विश्वासेदविश्व्स्ते विश्वस्ते नातिविश्व्सेत् /*
*विश्वासाद् भयमुत्पन्न मूलान्यपि निकृन्तति//*
जो विश्वास का पात्र नहीं है उसपर विश्वास करें हीं नहीं, किन्तु जो विश्वास का पात्र है उसपर भी अधिक विश्वास न करें/ विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वो मूल का ही उच्छेद कर डालता है,
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