अमृता प्रीतम
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एक मुलाक़ात .... खुदा के साथ ....
एक दिन मिल गया खुदा मुझ को,
मैंने पूछा ये क्या हुआ तुझ को,
क्यों मेरे हौंसले बढ़ाता है ,
रोज़ सपने नए दिखाता है,
और फिर उन को तोड़ देता है ,
ला के रस्ते पे छोड़ देता है,
कई रिश्ते बने जो फिर टूटे,
कितने ही दोस्त राह में छूटे,
दे के सुख हाथ खींच लेता है ,
कर दुखी आँख मीच लेता है,
क्यों नहीं मेरा कुछ ख्याल तुझे ,
कुछ पता भी है मेरा हाल तुझे ....
हँस के बोला के क्यों बिगड़ती हो ,
मिल गया हूँ तो अब क्यों लड़ती हो ,
ख़ुशी थी तब ना किया मुझ को याद ,
ग़म में करने लगी हो तुम फ़रियाद .
इसको तकलीफ अपनी कहती हो ,
ये तो कुछ भी नहीं जो सहती हो,
ज़िन्दगी के कठिन ये रस्ते हैं ,
यहाँ सुख हैं तो दुःख भी बसते हैं,
जो भी इन पर से गुज़र जाता है,
अपनी मंज़िल को वो ही पाता है ...
परेशानी तो इक बहाना था ,
तुझ को अपने करीब लाना था ,
हर एक इंसान को परखना है ,,
मुझ को सब का ख़याल रखना है
सब के दुःख दर्द मैं भी सहता हूँ ,
मैं तुम्हारे भी दिल में रहता हूँ ....
कभी मुझ से जो मिलना चाहोगी,
किसी रोते को गर हँसाओगी ,
कभी छोड़ूंगा ना मैं साथ तेरा ,
तेरे सर पे रहेगा हाथ मेरा ....
----- अमृता प्रीतम जी -----