रीति और प्रीति
सुनो मेरे मीत
यहाँ किसको है किससे प्रीत ?
इस दुनिया को समझो
यह चलती है धन पर।
जब तक धन होता है
सच्चे होते है सपने
सभी होते है अपने
सभी करते हैं गुणगान
हम समझते लगते हैं
अपने आप को महान
जिस दिन धन की नदी सूख जाती है
अपने तो क्या अपनी किस्मत भी रूठ जाती है
वे करने लगते है उपहास
जो रहते थे सदा हमारे पास
कोई नही देता सहारा
सभी कर लेते है किनारा
लेकिन वह परम पिता
नहीं छोडता है अपने पुत्रों का साथ
बढ़ाओ उनकी ओर हाथ
यदि चरित्र में होगी ईमानदारी
तथा कर्म में लगन व श्रम
मन में होगी श्रद्धा व भक्ति
परम पिता के प्रति सच्ची आसक्ति
तो वे थामेंगे तुम्हारा हाथ
बतलाएंगे तुम्हें रास्ता
और देंगे तुम्हारा साथ
जीवन में होगी स्नेह की बरसात
रूठे हुए भी मान जाएंगे
दूर वाले भी पास आएंगे
यही है दुनिया की रीत
बनी रहे सदा परमात्मा से प्रीत l