मृत्यु(भाग-१)
पड़ोस से रोने की आवाज़ें आ रही थीं।
मैंने बाहर जाकर देखा तो उनके दरवाज़े पर मृत्यु को खड़ा पाया।
हाँ! 'मृत्यु को'।
मृत्यु कुरूप थी। बेरंग, काले लिबास को पहने अट्टहास करती हुई।
मुझे खुद की ओर देखता पाया तो मेरी ओर आने लगी। मैं मुस्कुरा दी.. मेरी मुस्कुराहट उसे शायद भद्दी लगी, तभी उसने अपने कदम रोक लिए और मुझे अपनी ओर बुलाया।
मैं चल दी बिना किसी संकोच और भय के।
मेरे निकट पहुंचते ही उसने सवाल किया 'तुम्हें मुझसे भय नहीं लगता'!
मैंने बिन कुछ कहे 'ना' में गर्दन हिला दी।
उसने अभिमान से कहा 'मैं चाहूँ तो अभी इसी समय तुम्हें अपने आलिंगन में ले लूँ'।
ऐसा सुनकर मैंने मुस्कुराकर बाहें फैला दीं।
उसने विस्मय से पूछा.. जीना नहीं चाहती।
मैंने बिना किसी भाव के कहा 'मैं मृत हूँ.. मेरी मानसिक मृत्यु हो चुकी है केवल यह निर्जीव देह बाकी है'।
उसने चौंककर पूछा 'मेरे प्रति इतनी उदासीनता क्यों.. क्या कुछ प्रिय छीन लिया है मैंने तुमसे'?
इस बार चौंकने की बारी मेरी थी। मैंने तंज किया.. 'क्या तुम्हें नहीं पता'?
अब मृत्यु और कुरूप लग रही थी मगर अब भी जिज्ञासा शेष थी।
उसने पूछा 'क्या कुछ बाकी रह गया है.. कुछ कहना था उससे'?
मैंने और भी भद्दी मुस्कुराहट के साथ कहा..
'हाँ! बहुत सारे लोगों की शिकायत करना रह गया। कहना था उससे की लोग अच्छे नहीं हैं। रिश्ते सच्चे नहीं हैं। भावनाएं खारी हैं लोगों की और प्रेम छल। बहुत सारे आँसुओं को बहाना रह गया। बहुत सारे सपनों का पूरा होना रह गया..'?
मैं कहते कहते रुक गई।
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क्रमशः
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