अपने पंखों को आज तोड़ के फेंक दिया
अब कहीं उड़ कर नहीं जाऊंगी ,,,,उड़ने का शौक है मुझे
पर तुम्हारी कीमत पर नहीं ,,,क्या करूंगी मैं आसमां का
तुम बिन ,किस बादल को अपना कहूंगी ,,,
कौन सी दिशा मेरी होगी ,तुमसे जुदा मैं कैसे जीऊंगी ,,,
तुम आधार हो मेरे प्रेम का , मैं सम्पूर्ण हूं तुमसे
क्या करूंगी मैं इन सुंदर पंखों का जब मेरी उड़ान ही तुम तक है मेरी मंज़िल का हर रास्ता तुम पर ही ख़तम होता है
तुम नहीं आ सकते मूझतक तो ना सही ,,,,
मैं ही हर बंधन तोड़ तुम तक आ गई ,,प्रणय प्रेम का था ये देखो मैं निभा गई