लघुकथा- वो मरा नहीं
रोज की तरह उसने बस को अड्डे पर खड़ी कर वही चाय की गुमटी पर पहुँच बीड़ी सुलगा ली.एक लंबा कश खींचकर धुएँ के गुबार के साथ, एक कप चाय भी पेट में डाल ली.एक नजर कलाई पर बॅंधी घड़ी पर डाल वह बस की ओर लौट आया और अपनी नियत ड्राइवर वाली सीट पर आ बैठा. सुबह ही मालिक से आमदनी में कमी के ताने के साथ नौकरी से निकालने की धमकी से खिन्न...पीछे से सवारियों की वही रोज-रोज की चिल्लपों की आतीं आवाजें सुनकर उसका मन कसैला हो गया 'अपनी जिंदगी में क्या बनने आया था? और क्या बन कर रह गया' मन ही मन सोच कर उसने बीड़ी का एक लंबा कश खींचकर हवा में छोड़ दिया मानो धुएँ के साथ-साथ सारा दर्द भी उड़ेल देना चाहता हो. बीड़ी का आखिरी कश लेकर उसने बस आगे बढ़ायी ही थी, कि कंडक्टर की किसी को तेज आवाज में डाॅंटने की आवाज सुनकर "ओए जमूरे क्या हुआ? "
"उस्ताद!...इस लौंडे की हिम्मत तो देखो...बस पर आ बैठा और किराया देने एक फूटी कौड़ी भी नहीं है."
कंडक्टर की उंगली की तरफ उसने नजर घुमाई...देखा कि दस- बारह साल का लड़का सहमा- सा खड़ा था."
" क्यों बे,...पैसे नहीं है तो काहे बैठा बस में? " उसने अपनी लाल -लाल आॅंखों से घूरते हुए कहा.
"जी..जी ..व...वो...मेरे बाबा पैसे लेकर आने वाले थे..पर पता नही क्यों नहीं आए.."
" कैसे मानूं? कि तू सच बोल रहा है?"
"अपनी अम्मा की कसम... "
"अच्छा अच्छा,... ये बता तू कौन है!...पहले तो कभी नहीं देखा? " उसने थोड़ा नरम पड़ते हुए कहा.
" मैं गाॅंव से पढ़ने के वास्ते आया हूँ ."
"अच्छा! तू पढ़ने आया है."अचानक से वह खुश होते हुए बोला "ठीक है,..आ मेरे सामने वाली सीट पर बैठ जा.आज से ये तेरी जगह है... रोज मैं तुझे स्कूल छोड़ दूॅंगा."
"जी." बच्चा आश्चर्य मिश्रित भाव लिए सीट पर बैठ गया.
अब वह बस चलाते हुए लगातार बीच-बीच में उस लड़के की ओर देख लेता और गुनगुनाने लगता.बच्चे को उसके गन्तव्य पर उतारकर बस आगे बढ़ी, कंडक्टर ने हैरानी के साथ कहा "उस्ताद जी, आपने उस लौंडे से एक पैसा भी न लिया और रोज फोकट में छोड़ने की भी हामी भर दी? "
"अरे! तू नहीं समझेगा?"
"क्या नहीं समझूंगा ? क्या यह आपका कोई रिश्तेदार ..."
" हाँ! रिश्तेदार ही समझ ले.बरसों पहले मैं भी तो ऐसे ही अपने गाॅंव से पढ़ने के लिए आया था."
जमूरा आज पहली बार उसकी लाल-लाल सख्त आॅंखों में नरमी और नमी एक साथ देख रहा था.
(मौलिक)
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अर्चना राय