रात भर सीढ़ियां चढ़ती रही चांद तक जाने के लिए
ख्वाब था ये अधूरा तो रह जाना था ,
आंसूओं का ना जाने कौन सा रिश्ता है आंखो से
बह कर आंखो से फिर आंखो में ही रहती है,
बच्चा ही है ये दिल शायद इसलिए मचल जाता है
मेरी तरह बड़े होने की नादान ज़िद जो करता है ,
चलो गलती हुई जो इश्क़ किया पर गुनाह तो नहीं था
मुनासिब था जो दिल तोड़ते सजा खामोशी की क्यों दिया
यकीनन तू मुझे वक़्त बे वक़्त याद करता होगा
तभी तो मेरा हिचकियों से रिश्ता नहीं टूटता ।