हमारे गाँव का मौसम गुलाबी हो गया है ।
मेरे उपवन के वृक्षों पर जवानी आ गयी है ।
धुँए पहचान होते थे कभी गाँव के मेरे ।
वहाँ तारों के जरिए बिजली रानी आ गयी है ।
गोधूलि अपना अर्थ खोती जा रही है ।
नयी पीढ़ी को सड़कों की कहानी भा गयी है ।
हमने जहाँ सीखा ककहरा बैठ टाटों पर ।
उन्हीं विद्यालयों में चेयर संस्कृति छा गयी है ।
प्रगति के सोपान उन्नति की कथा के पात्र हैं ।
पर कहीं यह ही हमारी एकता को खा रही है ।
नज्मा की शादी में दादी सोचकर यह थक गयी ।
क्या हुआ लखना की अम्मा चुपके -चुपके जा रही है ।
क्या सोहर क्या बिआहू एक जैसे थे कभी ।
आज क्यों नज्मा की अम्मी उल्टा सुल्टा गा रही हैं ।