शुक्र है!
कि मैं तुझे लिखता नहीं,..
लिखता तो न जाने कितना लिखता।
यहाँ तो मैं खुद को ही लिख रहा हूँ..
फिर भी कुछ लोगों को आशिक मिज़ाज दिख रहा हूँ।
हाऽहाऽ🤨🤨
आंख के अंधे कान से बहरे...
कुछ रोगी बिमार जनों के
हम एकही तिमारदार जो ठहरे।।
-सनातनी_जितेंद्र मन