*भरोसे का आशियाना तलाशता हूं*
मैं जिंदगी जीने का बहाना तलाशता हूं
इक भरोसे का आशियाना तलाशता हूं।
जो बेवफा बन कर चले गये हैं जिंदगी से
उन्हीं दोस्तों का ठिकाना तलाशता हूं।
वो शिकारी हैं उन्हें जान लेने की आदत है
और कितने बने हैं निशाना तलाशता हूं।
सुबह से शाम कल बड़ी सोगवार गुजरी
आज रात चैन का ठिकाना तलाशता हूं।
नूर-ए-हयात के सुने हैं बड़े चर्चे हमने
वहां का मौसम है शायराना तलाशता हूं।
सालों गुजर गए खुल कर मुस्कुराए हुए
वो पहले सा खिलखिलाना तलाशता हूं।
❤️❤️❤️