" गणतंत्र "
अपना भारत देश सदा से , सभी गुणों की खान था
धन संपदा और ज्ञान कला का , सकल जगत में मान था
वसुधैव कुटुंबकम् भाव था अपना , जो अपना अभिमान था
ज्ञान विज्ञान खगोल और ज्योतिष , अपने देश की शान था
कुछ गद्दारों की काली करतूतों से , देश की आभा थी चली गई
विदेशी कायर नरपिशाचों से , इस देश की आत्मा थी छली गई
अनवरत कोशिशें जारी थीं , सभ्यता संस्कृति को मिटाने की
दुश्मन यह देख अचंभित था , होड़ थी सर को कटाने की
धर्म सनातन मिट न सका , मिट गईं सभ्यताएं कितनी
इसका न आदि और ना अंत , इसकी जड़ है गहरी कितनी
उनकी रत्ती भर औकात न थी , बाल भी बांका करने की
ऐसी तो न कोई बात ही थी , जो बात हो कोई डरने की
कोई कितना भी ताकतवर हो , अपनों से मात वो खाता है
यह बात जब - जब चरितार्थ हुई , तब - तब हार से अपना नाता है
सदियों की मिली गुलामी से , सूरज स्वतंत्र फिर उदय हुआ
आज़ादी का सपना सच होते ही , प्रफुल्लित हम सबका हृदय हुआ
हम सबको यह प्रण लेना है , अब भूल न हमसे हो कोई
ना दृश्य दुबारा दिखे कभी , जब देश की आत्मा थी रोई
डर नहीं है हमको बाहर से , डर है देशी जयचंदों से
इनकी जगह जहन्नुम है , बच पाएं ना फांसी के फंदों से
हम जैसे भी और जहां रहें , जन - जन अब तो स्वतंत्र हैं
कर्तव्य रहे सबसे आगे , महापुरुषों का यही मंत्र है
लहराए तिरंगा नभ में सदा , अमर ये लोकतंत्र है
सबसे सुंदर सबसे प्यारा , अपना ये गणतंत्र है
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