" लज्जित होते हैं "
खुशियां बहुत ही मनाई थी पुत्र पैदा होने पर,
मां बाप ने कई सपने दिल ही दिल में सजाऐ थे।
बेटे की सवारने के लिए जिंदगी ,
माता-पिता अपनी खुशियों को त्याग रहे थे।
वक्त का खेल देखो जब बेटे कमाने लगते हैं,
और सपने मां-बाप के वो आंसू बनाने लगते हैं।
कंधे पर जिन पिता ने बेटों को घुमाया था कभी,
वही बेटे आज उनको कंधा देने में लज्जित होते हैं।
मात-पिता ईश्वर का दूसरा रूप लगता है,
जाने किस दौर की यह बात है।
दुख भरी जीवन जिया ना ही कुछ जान पाएं ये कभी,
पढ़ें भी नहीं खुद पर बच्चों को खुब पढ़ाया इन्होंने।
अपना निवाला भी जो बच्चों को खिलाया,
वो आज दो रोटी भी बड़ी मुश्किल से पाते हैं।
लोरिया सुनाकर सुलाते थे "मित्र" कभी,
आज बेटे की सुन गालियां सो जाते है।
✍️मनिष कुमार "मित्र" 🙏