इक रब के भरोसे ही फ़क़त उम्र गुज़ारी हमने
होने न दिया झूठ को सच्चाई पे भारी हमने।
मौक़ा है मिला जब भी, हुई भूल सुधारी हमने
दौलत को नहीं करने दिया खुद पे भारी हमने।
इक रोज़ कलेजे से लगाएंगे हमें वो आकर
फिलहाल अभी तक है ये उम्मीद न हारी हमने।
जान अपनी, ज़माने को परख, रब के हवाले कर दी
जब फैले हुए देखा हर एक ओर शिकारी हमने।
कृपाशंकर श्रीवास्तव 'विश्वास'